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अतिशेष शिक्षा के गुणवत्ता , सर्व व्यापीकरण में बाधक*—– भुवनेश्वर देवाँगन प्रांतीय मंत्री बेबाक टिप्पणी

लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में शिक्षा के लोकव्यापीकरण के साथ गुणवत्ता और कौशलयुक्त शिक्षा निहित है। किसी राज्य में श्रेष्ठ मानव संसाधन की परिकल्पना ,उपलब्धता शिक्षा के सारोकार से संभव है। समय के साथ बदलाव शिक्षा की आवश्यकता है। यही कारण है आधुनिक भारत और वैश्विक क्षेत्र में हो रहे बदलाव की बयार को देखते हुए भारत सरकार ने अंतरिक्ष विज्ञानी कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में शिक्षा आयोग गठित कर NEP2020 की रूपरेखा प्रतिपादित करते हुए संपूर्ण देश में लागू किया। शिक्षक प्रसन्न हुए कि नए समृद्धशाली राष्ट्र निर्माण में शिक्षा के माध्यम से देश के नौनिहाल को श्रेष्ठ संस्कार युक्त शिक्षा देंगे। इस लिहाज से नई शिक्षा सही समय पर लाया गया युगांतरकारी दस्तावेज है।

लेकिन अतिशेष के मुद्दे पर सर्वाधिक परेशान शिक्षक ही हो रहा है । कालान्तर में इसके परिणाम पर गौर करे तो पदोन्नतियां ही प्रभावित नहीं होंगी बल्कि रोजगार के अवसरों में कमी , शिक्षा में निजीकरण के हस्तक्षेप की आशंका बढ़ जाएगी।
कम दर्ज संख्या वाले स्कूलों का समायोजन , एक परिसर के स्कूलों का समायोजन मुफीद नहीं रहते हुए स्वीकार्मक जो सकता है लेकिन सेट अप के साथ बिखराव समझ नहीं आता कि किस शिक्षाविद् के सलाह पर पांच कक्षाओं के लिए केवल दो शिक्षक का पैमाना रखा गया है ,बस्तर जैसे इलाके में कम दर्ज संख्या के कारण 90% से अधिक विद्यालय में केवल दो ही शिक्षक रह पाएंगे। माध्यमिक में प्रधान पाठक सहित केवल चार शिक्षक रहने की संभावना है। हाई स्कूलों में संस्कृत और वाणिज्य जैसे विषयों पर प्रभाव पड़ने की आशंका है।
समय की सार्थकता तब है जब अतिशेष मुद्दे पर शासन के साथ आवेदन ,निवेदन ,ज्ञापन वार्ता कर रास्ता निकाल कर शिक्षा ,शिक्षक को यथास्थिति में रखे। इसे राजनीतिक मुद्दा न बनाकर केवल शिक्षकीय मुद्दा रखकर संघर्ष करना होगा। शासन का केविएट दायर करना सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, इसके लिए सबको एक सर्व शैक्षिक संघर्ष मोर्चा बनाकर अपने अपने संगठनात्मक , वर्ग ,पदीय , इगो को छोड़कर रचनात्मक विरोध के लिए सामने आना होगा। लेकिन सबको एकता का संदेश देने वाला शिक्षक क्या एक होगा , प्राचार्य , प्रधान पाठक ,व्याख्याता (कुछ विषयों को छोड़कर) हमको क्या करना है के मूड , जो अतिशेष में नहीं है वे हम बच गए के मूड में , विभिन्न संघ अपने संघ के नेतृत्व के मूड में स्पष्ट एकाकार नहीं होते। यहां शिक्षकों को भी सोचना होगा कि अपने नेतृत्व को मजबूर करें सुखद हल के लिए।

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