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तीखार जीवन’ लघु कविता के माध्यम से प्रीति तिवारी ने व्यक्त किए जीवन के विविध रंग

जांजगीर-चांपा। साहित्य और रचनात्मक अभिव्यक्ति के क्षेत्र में जिले की प्रतिभाएं निरंतर अपनी पहचान बना रही हैं। इसी क्रम में बिलासपुर निवासी साहित्यकार प्रीति तिवारी द्वारा स्वरचित लघु कविता ‘तीखार जीवन’ इन दिनों पाठकों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। कविता में जीवन के विविध अनुभवों, संघर्षों और आत्मस्वरूप को सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है।
कविता में लेखिका ने स्वयं के व्यक्तित्व और जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रतीकों के माध्यम से दर्शाया है। उन्होंने जलेबी, मिर्च, मिश्री, कोयल, हंस और कागज जैसे रूपकों का प्रयोग करते हुए यह संदेश दिया है कि व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप बाहरी आडंबर से अलग होता है। कविता जीवन की जटिलताओं, भावनात्मक गहराई और आत्मविश्वास को उजागर करती है।
‘तीखार जीवन’ में लेखिका ने यह भी दर्शाया है कि समाज कई बार व्यक्ति को अलग-अलग नजरिए से आंकता है, लेकिन व्यक्ति की अपनी पहचान और आत्मबल ही उसकी वास्तविक शक्ति होती है। सरल भाषा और भावनात्मक शैली के कारण यह कविता पाठकों को सहज रूप से आकर्षित कर रही है।
जांजगीर-चांपा जिले के साहित्य प्रेमियों ने प्रीति तिवारी की इस रचना की सराहना करते हुए इसे जीवन की सच्चाइयों को अभिव्यक्त करने वाली प्रभावशाली कृति बताया है। साहित्य जगत में ऐसी रचनाएं नवोदित लेखकों को भी प्रेरणा प्रदान कर रही हैं।
प्रीति तिवारी की यह स्वरचित कविता समाज को यह संदेश देती है कि व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप को समझते हुए आत्मविश्वास के साथ जीवन जीना
पढिए कविता ‘तीखार
लघु कविता का शीर्षक है:- ‘तीखार जीवन’
सरल हूं, पर मैं सादा चावल हूं नहीं ।
जलेबी हूं,पर मैं सीधी हूं नहीं ।
मिरची हूं , पर मैं तिखी हूं नहीं।
मिश्री हूं, पर मैं मिठी हूं नहीं।
दुनिया कहती तीतर- बीतर,
पर मैं बिखरी हूं नहीं।
कड़वी लगती मेरी बोली ,
पर मैं कोयल हूं नहीं।
कहूं तो , मेरा ‘क्षीर’ रंगत ,पर मैं हंस हूं नहीं।
दल बना है मेरा ,पर मैं भीड़ हूं नहीं।
कहूं तो कलम हैं मेरा , पर मैं स्याही हूं नहीं।
कागज हूं, पर मैं कोरी हूं नहीं।
हर पन्ना दुनिया है मेरी, पर मैं लिखती हूं नहीं।
सरल हूं, पर मैं सादा चावल हूं नहीं…..

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