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मेला एक तमाशा नहीं, जीवन का आईना – लेखिका प्रीति तिवारी के विचार

जांजगीर – समाज और संस्कृति के रंगों से सजा मेला भारतीय जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा रहा है। मेलों की चहल-पहल, भीड़, रंग-बिरंगी दुकानें, झूले, मिठाइयों की खुशबू और लोगों के चेहरों पर झलकती प्रसन्नता सदियों से हमारी लोक परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं। लेखिका प्रीति तिवारी अपने समसामयिक विचारों में मेले को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जीवन के विविध रंगों और मानवीय भावनाओं का दर्पण मानती हैं।
लेखिका का मानना है कि मेले की भीड़ में हजारों अनजान चेहरे होते हैं, जो अपनी-अपनी खुशियों, उम्मीदों और अनुभवों को खोजते हुए यहां पहुंचते हैं। पहली नजर में यह भीड़ केवल एक तमाशा प्रतीत होती है, लेकिन गहराई से देखने पर यह समाज की विविधता और मानवीय भावनाओं का सुंदर संगम नजर आती है। लोग मेले में केवल घूमने या खरीदारी करने नहीं आते, बल्कि अपने भीतर छिपी खुशियों और जीवन के उत्साह को महसूस करने आते हैं।
प्रीति तिवारी के अनुसार मेला एक ऐसा मंच है, जहां बूढ़े, बच्चे और युवा सभी समान रूप से खुशियों में शामिल होते हैं। झूलों की ऊंचाइयों को छूते बच्चे मानो अपने सपनों को उड़ान देते दिखाई देते हैं, वहीं मिठाइयों की मिठास और चाट-पकौड़ों का स्वाद लोगों के जीवन में आनंद घोलता है। खिलौने बेचने वाले, मिठाई बनाने वाले और कपड़ों के रंगों से सजी दुकानें केवल व्यापार नहीं, बल्कि लोगों के जीवन की कहानियां भी समेटे रहती हैं।
लेखिका यह भी कहती हैं कि मेले की अफरा-तफरी कई बार जीवन के संघर्षों की झलक देती है। भीड़ में शामिल हर व्यक्ति अपनी पहचान बनाने की कोशिश करता है, लेकिन कई बार वह उसी भीड़ में खुद को खोता हुआ भी महसूस करता है। यही मेला हमें यह सिखाता है कि जीवन भी एक यात्रा है, जहां लोग अपने सपनों और उम्मीदों के साथ आगे बढ़ते रहते हैं।
मेला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की जीवंतता का प्रतीक है। हर मौसम में लगने वाले मेले लोगों के दिलों में उत्साह और उमंग का संचार करते हैं। लोग पूरे वर्ष इन मेलों का इंतजार करते हैं और जब यह अवसर आता है, तो वे अपने परिवार और मित्रों के साथ इन खुशियों को साझा करते हैं।
लेखिका प्रीति तिवारी मेले को जीवन का एक प्रतीकात्मक खेल मानती हैं। उनके अनुसार जैसे मेले में रंग, रोशनी, भीड़, मिठास और हलचल का संगम होता है, वैसे ही जीवन भी विभिन्न अनुभवों और भावनाओं का मेल है। मेला हमें यह संदेश देता है कि हर मौसम, हर परिस्थिति और हर अनुभव जीवन को रंगीन बनाता है।
लेखिका के विचारों में मेला केवल भीड़ का जमावड़ा नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों, खुशियों और जीवन के उत्सव का प्रतीक है। उनके अनुसार मेला हमें यह एहसास कराता है कि जीवन की भागदौड़ के बीच भी खुशियों को महसूस करना और उन्हें साझा करना ही जीवन की वास्तविक सुंदरता है।

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