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भागवत ज्ञान सप्ताह यज्ञ : प्रथम दिवस की कथा में जीवन व प्रकृति संरक्षण का संदेश

रायपुर -हिरापुर (तेन्दूआ) में दूबे परिवार द्वारा आयोजित भागवत ज्ञान सप्ताह यज्ञ के प्रथम दिवस की कथा में व्यास पीठ से आचार्य दिवाकर आचार्य झम्मन शास्त्री महाराज ने गूढ़ आध्यात्मिक एवं सामाजिक विषयों पर सारगर्भित विचार रखे।


प्रथम दिवस की कथा में आचार्य श्री ने कहा कि ज्ञान यज्ञ का उद्देश्य केवल यश या इच्छा पूर्ति नहीं, बल्कि कथा के माध्यम से अंतःकरण की शुद्धि है। यदि भगवान को पाने की सच्ची इच्छा हो, तो केवल राजा परीक्षित और सुखदेव मुनि के संवाद का श्रवण ही जीवन को धन्य बना सकता है। उन्होंने अकाल मृत्यु से रक्षा हेतु श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण को अनिवार्य बताया।

आचार्य श्री ने कहा कि प्रभु की लीला के बिना न किसी का जन्म संभव है, न मृत्यु, क्योंकि समस्त कालचक्र में ईश्वर की सहमति विद्यमान रहती है। उन्होंने बताया कि अपूर्ण इच्छाओं के कारण जीवात्मा को पुनर्जन्म लेना पड़ता है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को दिन में कम से कम सवा घंटा प्रभु की स्तुति, भजन-कीर्तन में लगाना चाहिए।
महाराज श्री ने स्पष्ट किया कि जीवन का परम उद्देश्य ईश्वर प्राप्ति है, न कि केवल धन, वैभव और जीविकोपार्जन। उन्होंने कहा कि सरकार और राजनीतिक व्यवस्थाएँ परोपकार के लिए होती हैं, स्वहित के लिए नहीं, किंतु आज देश में गौमाता के चारागाहों पर भी अतिक्रमण हो रहा है। जब गौ संरक्षण की ठोस व्यवस्था नहीं होगी, तो शुद्ध दूध, घी, दही और मक्खन कैसे उपलब्ध होगा।
युवाओं की भागीदारी पर चिंता व्यक्त करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि भागवत और रामकथा का उद्देश्य भटकते युवाओं को धर्मग्रंथों से जोड़ना है, किंतु कथाओं में युवाओं की उपस्थिति नगण्य होती जा रही है। उन्होंने प्रत्येक घर से कम से कम एक युवा को धार्मिक कथाओं में शामिल करने का आह्वान किया।
छत्तीसगढ़ को भगवान श्रीराम का ननिहाल बताते हुए आचार्य श्री ने कहा कि यह पुण्य भूमि है, किंतु आज प्रकृति संकट में है। धरती माता को 104 डिग्री का बुखार है—ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और मानव विकास के नाम पर प्रकृति से अंधाधुंध छेड़छाड़ की जा रही है।
अंत में उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में विज्ञान को भावनात्मक और नैतिक मूल्यों से जोड़ने की आवश्यकता है, तभी सनातन धर्म मानवता और प्रकृति की रक्षा कर पाएगा।

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