
जगदलपुर- बस्तर दशहरे के बाद क्षेत्र के दूसरे सबसे बड़े धार्मिक आयोजन गोंचा महापर्व की शुरुआत सोमवार से विधि-विधान के साथ हो गई। रियासतकालीन परंपरा के अनुसार महापर्व का शुभारंभ चंदन यात्रा से किया गया। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा के 22 विग्रहों का इंद्रावती नदी के पवित्र जल, पंचामृत और चंदन से जलाभिषेक किया गया।
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हुए देवस्नान के बाद भगवान जगन्नाथ अब 15 दिनों के अनासर (अनवसर) काल में रहेंगे। इस अवधि में श्रद्धालुओं के लिए मंदिर में भगवान के दर्शन बंद रहेंगे। मान्यता है कि देवस्नान के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और विश्राम करते हैं।
इसके बाद 15 जुलाई को नेत्रोत्सव का आयोजन होगा, जिसमें विशेष पूजा-अर्चना के बाद भगवान के पुनः दर्शन शुरू होंगे। वहीं 16 जुलाई को श्री गोंचा रथयात्रा निकाली जाएगी, जिसमें भगवान जगन्नाथ रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण करते हुए भक्तों को दर्शन देंगे।
बस्तर में 619 वर्ष पुरानी यह परंपरा आज भी जगन्नाथ पुरी की तर्ज पर पूरे श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ निभाई जाती है। गोंचा महापर्व बस्तर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख उत्सव माना जाता है।



