
जांजगीर – भारत की पहचान उसकी विविध सांस्कृतिक परंपराओं और उत्सवों में रची-बसी है। इन्हीं में से एक है रंग पंचमी, जो केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, भाईचारे और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। समाजसेवी गीता सिंह का मानना है कि रंग पंचमी का त्योहार समाज में प्रेम और समरसता का संदेश देता है, जहाँ जाति, धर्म और वर्ग की दीवारें टूट जाती हैं और सब एक रंग में रंगकर समानता का अनुभव करते हैं।
पौराणिक महत्व:
रंग पंचमी के पीछे धार्मिक मान्यता है कि इस दिन आकाश में सात्विक और राजसिक तत्वों का संतुलन बनता है, जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने कामदेव को भस्म करने के बाद देवी रति के अनुरोध पर कामदेव को पुनर्जीवित किया था, जिससे देवताओं ने रंगों के साथ आनंद उत्सव मनाया था।
सामाजिक संदेश:
रंग पंचमी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि समाज में प्रेम और भाईचारा सबसे बड़ा धर्म है। इस दिन लोग जाति, धर्म और आर्थिक भेदभाव भूलकर एक-दूसरे को रंग लगाकर समानता का अनुभव करते हैं।
समकालीन संदर्भ में महत्व:
गीता सिंह का कहना है कि आज जब समाज में वैमनस्यता, ईर्ष्या और अलगाव की भावना बढ़ रही है, ऐसे में रंग पंचमी हमें याद दिलाती है कि क्यों न हम भी रंगों की तरह आपस में घुल-मिल जाएँ और समाज में प्रेम और सौहार्द का रंग बिखेरें।
रंग पंचमी: जीवन मूल्यों की पुनर्स्थापना:
यह पर्व हमें यह एहसास कराता है कि जीवन में प्रेम, भाईचारा और एकता सबसे महत्वपूर्ण हैं। रंग पंचमी की यह परंपरा हमें सिखाती है कि चाहे कितनी भी दूरियाँ क्यों न हों, रंगों की शक्ति सबको एक सूत्र में पिरो देती है। अतः हमें इस पर्व को हृदय से मनाकर समाज में प्रेम, सौहार्द और सद्भावना का संदेश फैलाना चाहिए, ताकि हमारी संस्कृति की यह अनुपम परंपरा सदैव जीवंत बनी रहे।



