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चावल उपार्जन घोटाला में जिला प्रबंधक के पत्र ने खोली पोल

मुख्यालय के संरक्षण में करोड़ों के चावल को वारे-न्यारे करने का आरोप

कोरबा- छत्तीसगढ़ के चावल उपार्जन कार्य में एक बड़े भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है। कोरबा के जिला प्रबंधक प्रमोद जांगड़े द्वारा मुख्यालय को लिखे गए एक पत्र ने विभाग के भीतर मचे हड़कंप को सार्वजनिक कर दिया है। इस पत्र में न केवल खराब चावल खरीदी की जांच के लिए गठित टीमों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं, बल्कि मुख्यालय के आला अफसरों और बेमेतरा जिला प्रबंधक की संदेहास्पद कार्यप्रणाली को भी उजागर किया गया है। पत्र के अनुसार इस पूरे प्रकरण की मुख्य सूत्रधार बेमेतरा जिला प्रबंधक अलका शुक्ला को बताई जा रही हैं। आरोप है कि उन्होंने बिना किसी आधिकारिक आदेश के महेश्वर लाल सोनवानी की आईडी बेमेतरा से कोरबा ट्रांसफर की। इसी आईडी का दुरुपयोग कर बेमेतरा में बैठे व्यक्ति के नाम पर कोरबा में एक बाहरी व्यक्ति से करोड़ों रुपये के शासकीय चावल की खरीदी फर्जी तरीके से की गई। इस पूरी प्रक्रिया में गुणवत्ता मानकों को ताक पर रखा गया, जिससे शासन को भारी आर्थिक क्षति हुई है। इस मामले में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक चूक भी सामने आई है। घोटाले में संलिप्त दोनों प्रमुख अधिकारी प्रशासन व्यवसाय संवर्ग से आते हैं। जानकारों का स्पष्ट मत है कि यदि इन पदों पर लेखा संवर्ग का कोई अनुभवी अधिकारी तैनात होता, तो वित्तीय नियमों की पकड़ और तकनीकी ऑडिट के कारण करोड़ों की यह हेराफेरी संभव ही नहीं होती। लेखा संवर्ग की अनुपस्थिति ने ही इस भ्रष्टाचार के लिए मार्ग प्रशस्त किया है।

मंत्री के पीए पर धमकाने का आरोप

मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब यह खबर सामने आई कि कोरबा गई जांच टीम को खाद्य मंत्री के पीए द्वारा धमकाया गया। एक प्रभावशाली पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा जांच को प्रभावित करने की कोशिश किसी बड़े सिंडिकेट की ओर इशारा करती है।

सरकार के सामने 3 तीखे सवाल

1. बिना आदेश आईडी ट्रांसफर करने वाली अलका शुक्ला को जांच के दायरे से बाहर क्यों रखा गया है?

2. करोड़ों के फर्जीवाड़े में केवल छोटे कर्मचारियों की बलि देकर बड़े अधिकारियों को क्यों बचाया जा रहा है?

3. क्या प्रदेश सरकार इस ‘सिंडिकेट’ पर कठोर कार्यवाही करेगी या मुख्यालय के अधिकारी शासन की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब रहेंगे?

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