रतनपुर- महामाया मंदिर प्रांगण में चल रही श्रीमद् देवीभागवत महापुराण कथा में कथा व्यास पूज्य आचार्यश्री झम्मन प्रसाद शास्त्री ने कहा कि मां भगवती प्रकृति स्वरूप हैं और हमें कण-कण से परोपकार की शिक्षा मिलती है।
उन्होंने कहा कि नदियाँ परोपकार के लिए बहती हैं, वृक्ष धूप में रहकर छाया प्रदान करते हैं, सूर्य की किरणें सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करती हैं, चन्द्रमा शीतलता देता है, समुद्र से वर्षा होती है, पेड़ों से फल-फूल व सब्जियाँ मिलती हैं, गायें दूध देती हैं और वायु से प्राणशक्ति मिलती है। यहां तक कि पशु भी अपने शरीर को नरभक्षियों के लिए अर्पित कर देता है। प्रकृति का यही त्यागमय वातावरण हमें निःस्वार्थ भाव से परोपकार करने की शिक्षा देता है।
आचार्यश्री ने कहा कि मानव जीवन बड़े पुण्यों से मिलता है और उसे परोपकार जैसे कार्यों में लगाकर ही सच्ची शांति व आनंद प्राप्त किया जा सकता है। परोपकारी व्यक्ति के लिए पूरा संसार कुटुंब बन जाता है — ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’। महर्षि वेदव्यास जी ने भी कहा है कि – “परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्।”
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि तुच्छ वृत्तियों को छोड़कर परोपकारी बनें और यथा-शक्ति दूसरों की सहायता करें।
कथा के दौरान दिव्य वेदियों की स्थापना, कलश यात्रा और महाआरती का आयोजन हुआ।



